मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है/रामधारी सिंह

Abhishek Ranavat

भारतीय साहित्य एक अनूठी विरासत है, जिसमें कई महान लेखकों और कवियों का योगदान है, जो देश की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत को जीवित रखते हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध नाम रामधारी सिंह दिनकर का है, जो हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महान व्यक्तित्व हैं। लेखन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका, उनकी देशभक्ति और उनका धार्मिक दृष्टिकोण उन्हें भारतीय साहित्य में एक अतुलनीय सितारे के रूप में चमकाते हैं।


सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।

 

मुख से न कभी उफ कहते हैं,
संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।

 

है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।

 

गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है
रोशनी नहीं वह पाता है।

 

पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,
झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,
बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।

 

 

वसुधा का नेता कौन हुआ?
भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?
अतुलित यश क्रेता कौन हुआ?
नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?
जिसने न कभी आराम किया,
विघ्नों में रहकर नाम किया।

 

 

जब विघ्न सामने आते हैं,
सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,
तन को झँझोरते हैं पल-पल।
सत्पथ की ओर लगाकर ही,
जाते हैं हमें जगाकर ही।

 

 

वाटिका और वन एक नहीं,
आराम और रण एक नहीं।
वर्षा, अंधड़, आतप अखंड,
पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड।
वन में प्रसून तो खिलते हैं,
बागों में शाल न मिलते हैं।

 

 

कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर,
छाया देता केवल अम्बर,
विपदाएँ दूध पिलाती हैं,
लोरी आँधियाँ सुनाती हैं।
जो लाक्षा-गृह में जलते हैं,
वे ही शूरमा निकलते हैं।

 

 

बढ़कर विपत्तियों पर छा जा,
मेरे किशोर! मेरे ताजा!
जीवन का रस छन जाने दे,
तन को पत्थर बन जाने दे।
तू स्वयं तेज भयकारी है,
क्या कर सकती चिनगारी है?


जीवनी

रामधारी सिंह दिनकर, जिन्हें दिनकर जी के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म 23 सितंबर, 1908 को सिमरा, बिहार में हुआ था। उनके पिता, बाबू रवींद्र प्रसाद सिंह, शिक्षा विभाग में कार्यरत थे, यही कारण है कि उनका बचपन परिवार के विभिन्न शहरों में बीता। दिनकर जी की प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण स्कूलों में हुई जहां उन्हें उनके माता-पिता और स्कूलों द्वारा भारतीय संस्कृति, इतिहास और धर्म के बारे में पढ़ाया गया। अपनी किशोरावस्था में, वे आगे की शिक्षा के लिए पटना चले गए और हिंदी साहित्य में डिग्री के साथ पटना विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

आजीविका

दिनकर जी ने अपने करियर की शुरुआत एक गाँव के स्कूल में एक शिक्षक के रूप में की थी, लेकिन साहित्य के प्रति उनके प्रेम ने उन्हें पूर्णकालिक लेखन के लिए प्रेरित किया। वे अपनी अनूठी लेखन शैली और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपने योगदान से हिंदी साहित्य जगत में एक प्रमुख व्यक्ति बन गए। उनकी रचनाएँ भारतीय पौराणिक कथाओं, संस्कृति और इतिहास के इर्द-गिर्द घूमती हैं, और उन्हें "रश्मिरथी," "कुरुक्षेत्र," और "उर्वशी" जैसी महाकाव्य कविताओं के लिए जाना जाता है। उनकी कविता तुलसीदास, कालिदास और शेक्सपियर जैसे महान कवियों की रचनाओं से प्रेरित थी।

पुरस्कार और उपलब्धियों

भारतीय साहित्य में दिनकर जी के योगदान को कई पुरस्कारों और सम्मानों से मान्यता मिली, जिसमें उनकी महाकाव्य कविता "कुरुक्षेत्र" के लिए 1959 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1959 में पद्म भूषण और हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार शामिल है। उन्हें 1978 में भारतीय ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।


निष्कर्ष

रामधारी सिंह दिनकर भारत के एक ऐसे साहित्यकार थे जिनकी रचनाएँ लोगों को प्रेरित और शिक्षित करती रहती हैं। ऐतिहासिक और पौराणिक तत्वों से भरपूर उनकी लेखन शैली ने हिंदी साहित्य को एक नया आयाम दिया है। वह एक सच्चे देशभक्त थे, और उनकी कविता भारत के स्वतंत्रता संग्राम की भावना को दर्शाती है। दिनकर जी की विरासत हमेशा भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगी और उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी।

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